Posts

Showing posts from January, 2026

ऋषिकेश का वह रहस्यमयी गुफा और एक मृत साधु का जीवित दर्शन

Image
क्या मृत्यु ही जीवन का अंत है? या फिर कुछ इच्छाएं, कुछ बंधन इतने प्रबल होते हैं कि वे मृत्यु की सीमा को भी लांघ जाते हैं? आज की "अनंत यात्रा" की कहानी एक ऐसे ही अनुभव के बारे में है, जो तर्क और विज्ञान की सारी दलीलों को खारिज कर देती है। यह कहानी है स्वामी तीर्थानंद जी के जीवन के उस अध्याय की, जहाँ लौकिक और अलौकिक के बीच की रेखा मिट गई थी। शुरुआत: एक विश्वास और एक प्रश्न कहानी की शुरुआत एक शांत कमरे से होती है, जहाँ लेखक शुभमानस घोष स्वामी तीर्थानंद जी से "गुरु लाभ" और ईश्वर प्राप्ति के बारे में पूछ रहे थे। स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "गुरु लाभ बड़ा सीधा नहीं है। उससे पहले चैतन्य लाभ होता है... याद है न बाबा के थान वाली घटना?" लेखक सिहर उठे। वह घटना ही ऐसी थी कि रीढ़ में सिहरन दौड़ जाए। स्वामी जी ने गंभीर स्वर में कहा, "यह जगत ईश्वर की कल्पना है, एक कहानी है। और कभी-कभी, इच्छाशक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह मृत्यु के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है।" शोक और हठ: मृत्यु को चुनौती यह उस समय की बात है जब स्वामी तीर्थानंद संन्यास लेने से पहले एक सा...

उत्तरकाशी और राजपुर के रहस्यमय गुप्त साधक: एक अविश्वसनीय सत्य कथा

Image
जीवन की अनंत यात्रा में हम अक्सर ऐसे संतों और साधकों की तलाश में रहते हैं जो हमें सत्य का मार्ग दिखा सकें। आज की यह कहानी लेखक गौतम विश्वास की एक अद्भुत यात्रा का वर्णन करती है, जो बंगाल के तारापीठ श्मशान से शुरू होकर हिमालय की गोद में उत्तरकाशी तक पहुँचती है। यह कहानी एक ऐसे गुप्त साधक की है जिन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी सन्यास की ऊँचाइयों को छुआ। भाग 1: तारापीठ महाश्मशान में पहली मुलाकात अमावस्या की घनी अंधेरी रात थी। तारापीठ महाश्मशान साधकों और तांत्रिकों से भरा हुआ था। कुछ असली थे, तो कुछ केवल दिखावा कर रहे थे। लेखक गौतम विश्वास एक सच्चे साधक की तलाश में वहां भटक रहे थे। तभी उन्हें द्वारका नदी के तट पर एक अत्यंत निर्जन स्थान पर मंत्रोच्चारण की ध्वनि सुनाई दी। वहाँ एक साधारण वेशभूषा में एक व्यक्ति, जो देखने में बिल्कुल साधारण लग रहे थे, एकटक ध्यान में मग्न थे। न कोई दिखावा, न कोई आडंबर। लेखक को लगा कि शायद यही वह सच्चा साधक है जिसे वह ढूंढ रहे हैं। घंटों इंतजार करने के बाद जब उस व्यक्ति का ध्यान टूटा, तो उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था, मानो भोर का सूरज खिला हो। भाग 2: साधक ...

बर्फ के बीच चमत्कार: रहस्यमयी हिमालय की एक अलौकिक यात्रा

Image
  कोलकाता से हिमालय  'अनंत यात्रा'  में आपका स्वागत है – जहाँ हम इस दुनिया के अनंत आध्यात्मिक रहस्यों की खोज करते हैं। आज हम आपको हिमालय के बर्फीले दिल में एक असाधारण अभियान पर ले चलते हैं। यह कहानी लेखक दीपांकर और समाजसेवी इंद्रनाथ मुखर्जी के वास्तविक अनुभवों पर आधारित है, जिन्होंने रहस्यमयी शंकर महाराज के मार्गदर्शन में यह यात्रा की थी। यह एक ऐसी दुनिया की कहानी है जहाँ भौतिक विज्ञान के नियम आस्था के सामने झुक जाते हैं। ईश्वरीय बुलावा  इस यात्रा की शुरुआत सिर्फ एक ट्रेकिंग के रूप में नहीं, बल्कि शांति की खोज में हुई थी। लेखक दीपांकर, सांसारिक शोर-शराबे से दूर, मन की शांति चाहते थे। अपने मित्र इंद्रनाथ के साथ, वे गंगोत्री के रास्ते में स्थित एक शांत गाँव हरसिल  पहुँचे। उनका उद्देश्य सिर्फ घूमना नहीं था, बल्कि "विभूति" (दैवीय शक्ति के अलौकिक प्रमाण) के दर्शन करना था, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे आज भी हिमालय की कंदराओं में मौजूद हैं। उनके मार्गदर्शक थे शंकर महाराज , एक ऐसे सिद्ध पुरुष जो मानव और दैवीय जगत के बीच की कड़ी प्रतीत होते थे। अपनी रहस्यमयी बातो...

भाग 4 - महातीर्थ की अंतिम यात्रा: ल्हासा, दलाई लामा और कैलाश-मानसरोवर का रहस्य

Image
शिगात्से शहर और सामने 'ताशिलुन्पो मठ' की छतें सुनहरी चमक रही हैं। फारी (Phari) के नरक जैसे शहर और वहां एक भारतीय व्यापारी से मिली कॉपियों को सीने से लगाए, मैं और मेरे गुरु गेशे रेपतेन आगे बढ़े। अब तक की यात्रा शरीर की परीक्षा थी, लेकिन अब जो शुरू होने वाला था, वह आत्मा की परीक्षा थी। हमारे सामने था 'देवताओं का शहर'—ल्हासा, और शिव का धाम—कैलाश। १. शिगात्से: सोने की छतों वाला शहर बर्फीले तूफानों को चीरते हुए हम शिगात्से (Shigatse) पहुँचे। यह तिब्बत का दूसरा सबसे बड़ा शहर था। यहाँ का मुख्य आकर्षण था— ताशिलुन्पो मठ (Tashilhunpo Monastery) । यह पंचेन लामा का निवास स्थान था। मठ की सोने की छतें दूर से ही सूरज की रोशनी में चमक रही थीं। मठ के भीतर हजारों लामा एक साथ मंत्रोच्चार कर रहे थे। उस गूँज से मेरा रोम-रोम कांप उठा। यहाँ चीनी सैनिकों का पहरा बहुत सख्त था। एक बार एक चीनी कमांडर ने मुझे रोका। उसने मेरी आँखों में झांककर देखा। मैं कांप रहा था, लेकिन मैंने अपनी जुबान नहीं खोली। गुरुजी ने तुरंत कहा: "यह जन्म से गूंगा है। यह बोल नहीं सकता।" सैनिक ने हिकारत से मुझे धक्का...

भाग 3 - तिब्बत के भीतर: एक 'मौन लामा' की आँखों देखी

Image
धर्म संकट: जब जीने के लिए एक शाकाहारी साधु को खाना पड़ा मांस। चुम्बी घाटी पार करने बाद हम तिब्बत के भीतरी इलाकों में थे। यहाँ की हवा में सिर्फ ठंड नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी गंध और रहस्य था। यहाँ मैंने जो देखा, उसने मेरे भारतीय संस्कारों और मेरी सोच को झकझोर कर रख दिया। १. मांसाहार की दुविधा: जब साधु को खाना पड़ा मांस चलते-चलते शाम हो गई थी। हम एक बूढ़ी तिब्बती महिला के घर रुके। बाहर हड्डियों को जमा देने वाली ठंड थी, लेकिन घर के भीतर अंगीठी की आग ने जान में जान डाल दी। उस बूढ़ी माँ और उसकी बेटी ने हमारे लिए खाना बनाना शुरू किया। उन्होंने एक बड़े बर्तन में पानी, आलू और आटे की लोइयां डालीं। लेकिन फिर... उन्होंने एक सूखी हुई चीज उठाई और उसे चाकू से काट-काट कर बर्तन में डालना शुरू किया। जैसे ही वह उबलने लगा, एक जानी-पहचानी गंध उठी। वह मांस था! सूखे हुए भेड़ का मांस! मैं १७ साल का एक बंगाली ब्राह्मण और ऊपर से अब एक 'साधु'। मेरे संस्कारों ने विद्रोह कर दिया। मैंने घबराकर गुरुजी (गेशे रेपतेन) का हाथ पकड़ा और फुसफुसाया: "गुरुजी! यह क्या? इसमें मांस है! हम तो साधु हैं, हम यह कैसे खा सकते...

भाग २: मौत के दर्रे (नाथुला) से तिब्बत में घुसपैठ: एक 'मौन लामा' की असली परीक्षा

Image
१४,००० फीट की ऊँचाई: नाथुला दर्रा और भारत का अंतिम छोर।   यह कहानी का दूसरा भाग है। अब बिमल दे एक साधारण लड़का नहीं, बल्कि एक बौद्ध भिक्षु 'गेलन लामा' बन चुका है। उसकी असली परीक्षा अब शुरू होती है—दुनिया की सबसे दुर्गम और प्रतिबंधित सीमा, भारत-तिब्बत सीमा (Nathula Pass) को पार करना। यहाँ बिमल दे की जुबानी उनकी रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्रा का अगला अध्याय है: गंगटोक के एंचे मठ में मेरी दीक्षा हो चुकी थी। सिर मुंडा हुआ था, बदन पर लामाओं वाले लाल कपड़े थे और हाथ में जपमाला। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव मेरा नाम था। गुरुजी ने मुझे नया नाम दिया था— "गेलन लामा" । और गुरुजी? पहली बार मुझे उनका असली नाम और पहचान पता चली। वे कोई साधारण साधु नहीं थे। वे थे महान्  रेपतेन । काठमांडू के चीनी दूतावास से ८ अप्रैल १९५६ को हमारे जत्थे के लिए अनुमति पत्र (Permit) आ गया था। लेकिन उस कागज पर मेरा नाम एक "नेपाली लामा" के रूप में था। एक भी गलती, एक भी शब्द अगर मेरे मुँह से हिंदी या बंगाली में निकला, तो चीनी सैनिक मुझे वहीं गोली मार देंगे या जेल में डाल देंगे। ९ अप्रैल की सुबह, हमने कंच...