ऋषिकेश का वह रहस्यमयी गुफा और एक मृत साधु का जीवित दर्शन
क्या मृत्यु ही जीवन का अंत है? या फिर कुछ इच्छाएं, कुछ बंधन इतने प्रबल होते हैं कि वे मृत्यु की सीमा को भी लांघ जाते हैं? आज की "अनंत यात्रा" की कहानी एक ऐसे ही अनुभव के बारे में है, जो तर्क और विज्ञान की सारी दलीलों को खारिज कर देती है। यह कहानी है स्वामी तीर्थानंद जी के जीवन के उस अध्याय की, जहाँ लौकिक और अलौकिक के बीच की रेखा मिट गई थी। शुरुआत: एक विश्वास और एक प्रश्न कहानी की शुरुआत एक शांत कमरे से होती है, जहाँ लेखक शुभमानस घोष स्वामी तीर्थानंद जी से "गुरु लाभ" और ईश्वर प्राप्ति के बारे में पूछ रहे थे। स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "गुरु लाभ बड़ा सीधा नहीं है। उससे पहले चैतन्य लाभ होता है... याद है न बाबा के थान वाली घटना?" लेखक सिहर उठे। वह घटना ही ऐसी थी कि रीढ़ में सिहरन दौड़ जाए। स्वामी जी ने गंभीर स्वर में कहा, "यह जगत ईश्वर की कल्पना है, एक कहानी है। और कभी-कभी, इच्छाशक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह मृत्यु के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है।" शोक और हठ: मृत्यु को चुनौती यह उस समय की बात है जब स्वामी तीर्थानंद संन्यास लेने से पहले एक सा...