भाग २: मौत के दर्रे (नाथुला) से तिब्बत में घुसपैठ: एक 'मौन लामा' की असली परीक्षा

१४,००० फीट की ऊँचाई: नाथुला दर्रा और भारत का अंतिम छोर।
 

यह कहानी का दूसरा भाग है। अब बिमल दे एक साधारण लड़का नहीं, बल्कि एक बौद्ध भिक्षु 'गेलन लामा' बन चुका है। उसकी असली परीक्षा अब शुरू होती है—दुनिया की सबसे दुर्गम और प्रतिबंधित सीमा, भारत-तिब्बत सीमा (Nathula Pass) को पार करना।

यहाँ बिमल दे की जुबानी उनकी रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्रा का अगला अध्याय है:


गंगटोक के एंचे मठ में मेरी दीक्षा हो चुकी थी। सिर मुंडा हुआ था, बदन पर लामाओं वाले लाल कपड़े थे और हाथ में जपमाला। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव मेरा नाम था। गुरुजी ने मुझे नया नाम दिया था—"गेलन लामा"

और गुरुजी? पहली बार मुझे उनका असली नाम और पहचान पता चली। वे कोई साधारण साधु नहीं थे। वे थे महान्  रेपतेन। काठमांडू के चीनी दूतावास से ८ अप्रैल १९५६ को हमारे जत्थे के लिए अनुमति पत्र (Permit) आ गया था। लेकिन उस कागज पर मेरा नाम एक "नेपाली लामा" के रूप में था। एक भी गलती, एक भी शब्द अगर मेरे मुँह से हिंदी या बंगाली में निकला, तो चीनी सैनिक मुझे वहीं गोली मार देंगे या जेल में डाल देंगे।

९ अप्रैल की सुबह, हमने कंचनजंघा को आखिरी बार नमन किया और तिब्बत की ओर कदम बढ़ा दिए।

१. नाथुला की चढ़ाई: बादलों के ऊपर का सफर

सिक्किम से तिब्बत जाने का रास्ता नाथुला दर्रे  से होकर गुजरता है, जो १४,००० फीट से ज्यादा की ऊँचाई पर है। मेरे पास सामान के नाम पर क्या था? एक कंबल, थोड़ा सत्तू, नमक और ६ किलो का बोझ। जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे, हवा पतली हो रही थी और ठंड हड्डियों को काट रही थी। हम 'करपोनांग' और 'छांगू'  होते हुए आगे बढ़े। छांगू में हमें एक छोटी सी लकड़ी की सराय में रात बितानी पड़ी जहाँ ३२ लोगों को जानवरों की तरह ठूंस-ठूंस कर सोना पड़ा।

अगली सुबह जब हम नाथुला के करीब पहुँचे, तो भारतीय सैनिकों ने हमें रोका। सैनिक: "कहाँ जा रहे हो? आगे जाना मना है।" गुरुजी (गेशे रेपतेन) ने निडर होकर कहा: "हम तीर्थयात्री हैं, कैलाश और मानसरोवर जा रहे हैं।" काफी बहस और कागज दिखाने के बाद, भारतीय मेजर ने हमें जाने दिया। उन्होंने हमें गर्म चाय और रोटी खिलाई और विदा करते हुए कहा, "पागल हो तुम लोग, इस मौसम में वहाँ जा रहे हो!"

और फिर, हमने वह लकीर पार की। पीछे भारत था, आगे रहस्यमयी तिब्बत। हमने एक-एक पत्थर उठाकर वहाँ बने 'ओबो' (पत्थरों का ढेर) पर रखा—यह हिमालय को नमन करने का तरीका था।

विदाई का रस्म: एक पत्थर रखकर भारत को नमन और तिब्बत में प्रवेश।

नाथुला पार करते ही दृश्य बदल गया। अब हम चुम्बी घाटी में थे। यहाँ की हवा में एक अजीब सा डर था। हर तरफ चीनी सैनिकों (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) के तंबू थे। गुरुजी ने मुझे चेतावनी दी: "याद रखना, तू 'मौन' है। एक शब्द नहीं।"

हम चुम्बी शहर की एक चेक-पोस्ट पर पहुँचे। यह एक परीक्षा की घड़ी थी। ३२ लामाओं का जत्था और सामने मशीनगनों से लैस चीनी सैनिक और उनके तिब्बती जासूस। सैनिकों ने हमारा सारा सामान सड़क पर खुलवा लिया। हमारे कपड़े, कंबल, सत्तू—सब कुछ की तलाशी ली गई। घंटों तक हम ठंड में ठिठुरते रहे।

२. पूछताछ का वह खौफनाक पल

मेरी बारी आई। मुझे एक अंधेरे कमरे में ले जाया गया। सामने चार चीनी अफसर और दो तिब्बती अनुवादक बैठे थे। उन्होंने पूछा: "तुम्हारा नाम क्या है?" मैं चुप रहा। बस अपनी माला जपता रहा। उन्होंने फिर पूछा: "कहाँ से आए हो?" मैं फिर भी चुप रहा। गुरुजी ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि यह मेरा शिष्य है और इसने मौन व्रत ले रखा है।

तभी, एक तिब्बती जासूस (जो शायद चीनी सेना का मुखबिर था) मेरे पास आया। वह बहुत चालाक लग रहा था। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा। मेरी शक्ल-सूरत पूरी तरह से पहाड़ी नहीं थी, और यह बात उसे खटक रही थी। वह मेरे कान के पास आया और फुसफुसाया: "हम्म्... दार्जिलिंग से आए हो? तुम नेपाली नहीं लगते।"

मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। अगर वह पकड़ लेता कि मैं बंगाली हूँ, तो खेल खत्म था। वह और करीब आया, बदतमीजी से मेरे कंधे को धक्का दिया और गाली देते हुए बोला: "नाटक बंद कर! नाम बोल अपना!"

वह मुझे उकसा रहा था ताकि मैं गुस्से में कुछ बोल पड़ूँ। मेरे हाथ-पाँव कांपने लगे थे, ठंड से नहीं, डर से। मुझे लगा अब मैं पकड़ा गया।

मौत का कमरा: चीनी चेक-पोस्ट पर 'मौन लामा' की अग्नि-परीक्षा।

३. मंत्र का वार: मेरा 'जादुई' हथियार

तभी मुझे गुरुजी की एक बात याद आई—"तिब्बती लोग तंत्र-मंत्र और श्राप से बहुत डरते हैं।" मैंने तुरंत अपना पैंतरा बदला। मैंने अपनी जपमाला को जोर से घुमाया और अचानक उस जासूस की ओर बढ़ा। मैंने माला उसके सिर पर मारने का नाटक किया और जोर-जोर से गायत्री मंत्र (जो उसे संस्कृत का कोई भयानक श्राप लगा होगा) बुदबुदाने लगा: "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं..."

मेरी आँखों में गुस्सा और हाथ में माला देखकर वह जासूस घबरा गया। उसे लगा कि यह 'मौन लामा' कोई तांत्रिक है और उसे श्राप दे रहा है। वह "अरे रे! नहीं नहीं!" चिल्लाता हुआ पीछे हटा और कमरे से भाग खड़ा हुआ।

चीनी अफसर यह सब देख रहे थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उन्हें लगा कि यह लामा सच में कोई पहुचा हुआ फकीर है। उन्होंने हाथ हिलाकर मुझे जाने का इशारा किया।

मैं बाहर निकला, ठंडी हवा में गहरी सांस ली। मेरा दांव सही लगा था।

जब गायत्री मंत्र बना हथियार: जासूस को भगाने का 'तांत्रिक' नाटक।

४. पहली रात: कुत्तों का हमला और 'चा' (तिब्बती चाय)

छूटने के बाद हम अंधेरे में आगे बढ़े। रात हो चुकी थी। अचानक अंधेरे में हम पर एक दर्जन खूंखार तिब्बती कुत्तों (Mastiffs) ने हमला कर दिया। वे शेरों जैसे बड़े थे। हम लाठियों के सहारे एक-दूसरे से चिपक कर खड़े हो गए। गनीमत रही कि गाँव वाले लालटेन लेकर आ गए और कुत्तों को भगाया।

तिब्बती रात का खौफ: जब यमदूत बनकर आए खूंखार कुत्ते।

उस रात हमें एक स्थानीय सराय में जगह मिली। भूख से पेट में आग लगी थी। वहाँ हमें पहली बार तिब्बती चाय मिली। यह चाय नहीं, सूप जैसा था। चाय की पत्तियों को उबालकर उसमें नमक, मक्खन और सत्तू मिलाया गया था। एक घूंट पीते ही शरीर में जान आ गई।

पहली राहत: ठंड में अमृत समान 'मक्खन वाली चाय' (Po Cha)।

उस रात जब मैं फटे पुराने कंबलों के बीच लेटा, तो मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने भारत छोड़ दिया है। मैं अब तिब्बत में था—वर्जित देश में। मैं, बिमल दे, अब एक 'मौन लामा' बनकर अपनी जिंदगी के सबसे बड़े रोमांच को जी रहा था।

(लेकिन असली खतरा तो अभी आगे था... ल्हासा अभी बहुत दूर था।)

अगले भाग में: तिब्बत के बीहड़ पठारों की यात्रा और यमदूतों से सामना।

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