भाग १ गया के रहस्यमयी साधु बाबा और गंगटोक मे तिब्बत जाने की जिद्द से ध्यान दीक्षा तक
लेखक: बिमल दे (भू-पर्यटक)
क्या आपने कभी घर की चारदीवारी से भागकर, बिना किसी मंजिल के, अनजान रास्तों पर चलने का सपना देखा है? मैं वही सपना जीने निकला था। मैं बिमल दे हूँ। उस समय मेरी उम्र महज १७ साल थी। स्कूल की किताबों और परिवार के अनुशासन से दूर, मैं दुनिया को अपनी आँखों से देखना चाहता था।
लेकिन मुझे नहीं पता था कि 'गया' की धूल भरी गलियों से शुरू हुई यह आवारागर्दी मुझे हिमालय की गोद और अंततः आध्यात्मिक शून्य तक ले जाएगी। यह कहानी मेरे और मेरे गुरु—उस रहस्यमयी साधु बाबा की है।
१. गया धाम: वो मुलाकात जिसने सब बदल दिया
मैं गया में था—जेब खाली, लेकिन दिल में आजादी। बिना टिकट ट्रेन के सफर और प्लेटफार्म की रातों के बीच, मेरी मुलाकात एक अजीब साधु से हुई।
वे कोई साधारण साधु नहीं थे। उनका पहनावा तिब्बती लामाओं जैसा था—लंबा चोग़ा और मालाएँ। लेकिन जब वे बोलते, तो कलकत्ता के पुराने मारवाड़ियों जैसी शुद्ध बंगाली निकलती। कभी-कभी लगता उनकी मातृभाषा हिंदी है। वे वेदों की बातें करते और बुद्ध की करुणा समझाते।
मैं उनकी सेवा में लग गया। वे मुझे अक्सर डांटते, "घर लौट जा, अभी तेरी उम्र पढ़ने की है।" पर मैं जिद्दी था। मैं उनके लिए बाजार से भीख मांगकर सब्जी लाता। वे इसे भीख नहीं, "अहंकार मिटाने का अभ्यास" कहते थे।
एक दोपहर, जब मैं बाजार से लौटा, तो देखा वे तीन अन्य लामाओं के साथ तैयार बैठे हैं। उन्होंने खाना खाया और अचानक अपना झोला उठाया। मेरे सिर पर हाथ रखकर बोले, "जीते रहो बेटा, भगवान तेरा भला करे।" मैंने पूछा, "इसका क्या मतलब?" वे बोले, "इसका मतलब विदाई।"
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। मैंने उनके सामने ही मिट्टी की हांडी फोड़ दी और सोचा, "धोखेबाज! मैंने इसकी सेवा की और ये मुझे छोड़कर जा रहा है।" मैंने पूछा, "कहाँ जा रहे हैं?" वे बस इतना बोले—"गंगटोक" और भीड़ में ओझल हो गए।
२. गंगटोक का पीछा: एक पागलपन भरी यात्रा
उस दिन मेरे दिमाग में बस एक ही शब्द गूँज रहा था—गंगटोक। मेरे पास पैसे नहीं थे, लेकिन एक जूनून था। मैं सिलीगुड़ी पहुँचा और वहाँ से तीस्ता बाजार। वहाँ से गंगटोक का रास्ता खड़ी चढ़ाई वाला था।
पहाड़ी रास्तों पर चलने के लिए मेरे पास न गर्म कपड़े थे, न जूते। सिर्फ एक हाफ पैंट और पतली शर्ट। अप्रैल का महीना था, लेकिन हिमालय की हवा हड्डियों को जमा रही थी। एक दयालु ट्रक ड्राइवर ने मुझे लिफ्ट दी। मैं ट्रक की छत पर बैठा, ठंडी हवा के थपेड़े खाता हुआ, आखिरकार बादलों के शहर गंगटोक पहुँचा।
३. भीड़ में गुरु की खोज
गंगटोक पहुँचकर मुझे अपनी बेवकूफी का एहसास हुआ। हजारों लामाओं और दर्जनों मठों के बीच उस एक साधु को कैसे ढूँढूँ? वहाँ मेरी दोस्ती एक स्थानीय पहाड़ी लड़के अंचू से हुई। वह मेरा साथी बन गया। हमने राजमहल के मंदिर से लेकर लामाओं के हर अड्डे (नाथ मंदिर) को छान मारा।
कई दिन बीत गए। उम्मीद टूटने लगी थी। क्या उन्होंने झूठ बोला था? तभी एक दिन, बस स्टैंड पर भीड़ के बीच मुझे वो चिर-परिचित चेहरा दिखा। वही थे! मेरे साधु बाबा! मैं दौड़कर उनके पैरों में गिर गया। वे मुझे देखकर जरा भी हैरान नहीं हुए, जैसे उन्हें पता था कि मेरा पागलपन मुझे यहाँ खींच लाएगा। उन्होंने मुझे उठाया और गले लगा लिया।
गुरुजी मुझे गंगटोक शहर से ऊपर, घने जंगलों के बीच स्थित एंचे गुम्फा ले गए। सामने कंचनजंघा पर्वत चमक रहा था और चारों तरफ पाइन के पेड़ थे।
४: एंचे मठ में सेवा और तिब्बत जाने की जिद्द
गंगटोक के एंचे मठ में मेरा प्रवेश एक साधु के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वयंसेवक के रूप में हुआ था। शुरुआत में गुरुजी ने मुझे कोई दीक्षा नहीं दी, न ही कोई मंत्र सिखाया।
1. मठ का रसोइया और सफाईकर्मी: मठ में रहने के लिए मुझे लामाओं वाले लाल-पीले कपड़े दे दिए गए थे, ताकि मैं वहां के माहौल में घुल-मिल सकूँ और अलग न दिखूँ। लेकिन अंदर से मैं वही १७ साल का बिमल था। मेरा काम तय था:
मूर्तियों की सेवा: दिन भर मैं मंदिर की विशाल बुद्ध और अन्य तांत्रिक देवी-देवताओं की मूर्तियों की धूल झाड़ता था। वहां के लामा उन मूर्तियों पर रंग-रोगन करते थे, और मैं उनका ब्रश और रंग पकड़ने में मदद करता था।
रसोई की चुनौती: मुझे रसोई में काम दिया गया। कलकत्ता में मैंने कोयले की अंगीठी देखी थी, लेकिन यहाँ लकड़ी के चूल्हे पर रोटियाँ सेकनी पड़ती थीं। धुएँ से आँखें जलतीं, पर गुरुजी को हाथ की बनी रोटी खिलाने का सुकून अलग था।
मैं खुश था। मुझे लगा कि जिंदगी यहीं ऐसे ही कट जाएगी—पहाड़ों के बीच, कंचनजंघा को निहारते हुए और गुरुजी की सेवा करते हुए।
2. बिछड़ने का डर और तिब्बत की बात: मार्च का महीना आ गया। मठ में चहल-पहल बढ़ने लगी। दूर-दूर से लामा इकट्ठा होने लगे। मुझे पता चला कि यह सब तिब्बत (ल्हासा) जाने की तैयारी है। गुरुजी भी अपना सामान धीरे-धीरे समेट रहे थे।
यह देखकर मेरा दिल बैठने लगा। गया में उन्होंने मुझे छोड़ दिया था, क्या यहाँ भी वही होगा? एक शाम, जब गुरुजी मठ के आंगन में टहल रहे थे, मैंने हिम्मत करके पूछा: "आप ल्हासा जा रहे हैं?" उन्होंने संक्षेप में कहा, "हाँ।" मेरा गला रुंध गया, पर मैंने तुरंत कहा: "मैं भी आपके साथ चलूँगा।"
3. गुरुजी का इनकार और मेरी जिद्द: गुरुजी रुक गए। उन्होंने मेरी तरफ देखा और एक स्निग्ध मुस्कान के साथ बोले: "कोई और होता तो मैं सीधे मना कर देता। लेकिन मैं जानता हूँ तू सुनेगा नहीं। पर बेटा, यह असंभव है।"
उन्होंने मुझे तीन बड़ी रुकावटें गिनवाईं:
"तू लामा नहीं है: तिब्बत के बॉर्डर पर चीनी सैनिक पहरा देते हैं। वे सिर्फ असली साधुओं को जाने देते हैं। तू तो एक साधारण बंगाली लड़का है।"
"तुझे भाषा नहीं आती: वहां कोई हिंदी या बांग्ला नहीं समझता। तू बॉर्डर पर पकड़ा जाएगा।"
"खतरा: यह जानलेवा यात्रा है।"
4. निर्णय की घड़ी: मैंने उनकी आँखों में देखा और हार मानने से इनकार कर दिया। मैंने कहा: "मुझे कुछ नहीं पता। अगर आप मुझे नहीं ले गए, तो मैं आपके पीछे-पीछे छुपकर आऊँगा, पर मैं आपको अब नहीं छोड़ूँगा। मुझे रास्ता बता दीजिये, मैं खुद चला जाऊंगा।"
मेरी यह 'पागलपन' भरी जिद्द देखकर गुरुजी सोच में पड़ गए। वे जानते थे कि मैं सच में पीछे आ सकता हूँ और मुसीबत में पड़ सकता हूँ। काफी देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहा: "तर्क करने से लाभ नहीं। मुझे सोचने दे।"
अगले दिन सुबह, उन्होंने मुझे बुलाया। उनके चेहरे पर एक निश्चय था। वे बोले: "अगर तुझे साथ जाना है, तो तुझे बदलना होगा। तुझे वो बनना होगा जो चीनी सैनिक भी न पकड़ सकें। तुझे एक 'साधु' बनना होगा—सिर्फ बाहर से नहीं, अंदर से भी।"
यही वह पल था जब मेरी भूमिका बदली। मेरी जिद्द के कारण गुरुजी ने फैसला किया कि वे मुझे विधिवत दीक्षा देंगे और मुझे 'मौन लामा' के रूप में तैयार करेंगे ताकि भाषा की समस्या ही खत्म हो जाए।
इसके बाद ही उन्होंने मुझे उस पत्थर पर बैठने का आदेश दिया और मेरी ५ दिनों की कठिन मानसिक ट्रेनिंग (ध्यान दीक्षा) शुरू हुई।
५. एंचे मठ: एक नया जन्म महाशून्य की ओर: मेरी ध्यान दीक्षा
पहला दिन: मोह की परीक्षा (Detachment)
दूसरा दिन: सीमा और अनंत
तीसरा दिन: विचार और बादल
चौथा दिन: उद्देश्य की तलाश
पाँचवाँ दिन: महामंत्र और दीक्षा
मठ के पीछे, घने जंगल में, एक बड़ा सा चपटा पत्थर था। गुरुजी मुझे वहाँ ले गए। चारों तरफ सन्नाटा था, बस हवाओं में पाइन के पेड़ों की सरसराहट थी। गुरुजी ने मुझे उस पत्थर पर बैठने का इशारा किया और यहीं से शुरू हुआ मेरा पाँच दिनों का विशेष प्रशिक्षण।
गुरुजी ने मेरे सिर पर हाथ रखा और पहला आदेश दिया: "आज दिन भर इस पत्थर पर बैठ और सिर्फ अपने घर के बारे में सोच। अपने परिवार, दोस्तों, स्कूल और उस दुनिया के बारे में सोच जिसे तू छोड़ आया है।"
मैं पत्थर पर बैठ गया। गुरुजी का आदेश था, तो मानना ही था। मैंने कोशिश की। मैंने अपनी दादी (ठाकुमा) को याद करने की कोशिश की, अपने स्कूल के दोस्तों को, अपने मोहल्ले को। लेकिन अजीब बात थी—घंटों बीत गए, पर मुझे कोई दुख नहीं हुआ, कोई याद नहीं सता रही थी। मुझे लगा, जिस घर को मैं पीछे छोड़ आया हूँ, वह अब मेरा नहीं रहा। मेरा असली परिवार तो यह जंगल, यह पहाड़ और मेरे गुरुजी हैं। पहले दिन मैंने सीखा कि संसार से मेरा बंधन टूट चुका है।
अगले दिन गुरुजी फिर आए। मैं पत्थर पर बैठा था। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और एक गहरा दर्शन समझाया। वे बोले: "सामने देख। ऊपर वो नीला आकाश है और नीचे यह विशाल पहाड़। आज तुझे सिर्फ इन दोनों को देखना है और सोचना है।"
उन्होंने सूत्र दिया:
आकाश : यह 'अनंत' (Infinite) है। यह महाशून्य है। यह सुख और दुःख से परे है।
पहाड़ : यह कितना भी विशाल क्यों न हो, यह 'सीमा' (Finite) में बंधा है। इसका एक आकार है, एक अंत है।
मैं दिन भर सोचता रहा। मुझे समझ आया कि मेरा शरीर इस 'पहाड़' की तरह है—सीमित और नश्वर, जहाँ सुख-दुःख का असर होता है। लेकिन मेरा मन, मेरी चेतना उस 'आकाश' की तरह हो सकती है—अनंत और मुक्त। अगर मैं आकाश बन जाऊँ, तो कोई दुःख मुझे छू नहीं पाएगा।
तीसरे दिन की सीख सबसे महत्वपूर्ण थी। गुरुजी ने कहा: "अपने मन को आकाश समझ और अपने विचारों को बादल। जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, वैसे ही मन में विचार आएँगे। उनसे लड़ना नहीं है, उन्हें रोकना नहीं है। बस चुपचाप एक गवाह की तरह उन्हें आते-जाते देख।"
मैं बैठा रहा। मन में घर के विचार आए, डर आया, भविष्य की चिंता आई। पहले मैं उनसे उलझता था, लेकिन आज मैंने उन्हें बस 'बादल' की तरह गुजरते हुए देखा। मैं यह देख पाया कि 'मैं' अपने 'विचारों' से अलग हूँ।
चौथे दिन मैं बहुत शांत हो गया था। गुरुजी ने आकर पूछा, "तू तिब्बत क्यों जाना चाहता है?" मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैंने बस कंचनजंघा की चोटियों को देखा। मेरी कोई इच्छा नहीं बची थी, बस एक प्रवाह था जिसमें मैं बह रहा था। गुरुजी समझ गए कि अब जमीन तैयार है, बीज बोने का समय आ गया है।
पाँचवें दिन, सूरज उगने से भी बहुत पहले, ब्रह्म मुहूर्त में गुरुजी ने मुझे जगाया। "जा, मुँह-हाथ धोकर आ।" बर्फीले ठंडे पानी से मुँह धोकर मैं कांपता हुआ मंदिर के अंदर पहुँचा।
मंदिर में घुप अँधेरा था, बस घी का एक दीया जल रहा था। उस मद्धम रोशनी में भगवान बुद्ध की विशाल मूर्ति रहस्यमयी लग रही थी। गुरुजी ने मुझे प्रार्थना बेदी पर बिठाया और कहा: "भगवान तथागत (बुद्ध) की आँखों में देख। पलक मत झपकाना।"
मैं बुद्ध की आँखों में देखने लगा। दीये की लौ का प्रतिबिंब उनकी आँखों में चमक रहा था। देखते-देखते मुझे लगा कि वह मूर्ति जीवित हो उठी है। बुद्ध की करुणा मेरी भीतर उतर रही थी। मेरा शरीर सुन्न होने लगा।
तभी गुरुजी मेरे कान के पास झुके। उनकी आवाज किसी दूसरी दुनिया से आती हुई लगी। उन्होंने कहा: "अब आँखें बंद कर। शरीर को बिल्कुल मत हिलाना। बस उस ज्योति को अपने भीतर महसूस कर..."
और फिर, उन्होंने मुझे वह मंत्र दिया, जो मेरी मुक्ति की चाबी बना। उन्होंने मेरे कान में फूंका: "बोल... ॐ मणि पद्मे हूँ (Om Mani Padme Hum)..." "मन ही मन इसे जप। ॐ मणि पद्मे हूँ... ॐ मणि पद्मे हूँ..."
मैं जपने लगा। शुरुआत में संघर्ष हुआ। मेरा मन भागता, मैं मंत्र को पकड़ता। विचारों का कुरुक्षेत्र बन गया था मेरा दिमाग। गुरुजी की आवाज फिर आई—"लड़ मत। विचार आते हैं तो आने दे। बस धीरे से मंत्र को फिर से स्थापित कर दे।"
और फिर... अचानक सब शांत हो गया। जैसे तूफान के बाद समुद्र शांत हो जाता है। मुझे लगा मैं पत्थर पर नहीं बैठा हूँ, मैं हवा में तैर रहा हूँ। मेरा शरीर रुई जैसा हल्का हो गया था। न सुख था, न दुःख। बस एक 'शून्य' था। एक गहरा आनंद।
काफी देर बाद जब मेरी आँखें खुलीं, तो दोपहर हो चुकी थी। मैं घंटों तक समाधि में था, पर मुझे लगा बस कुछ पल बीते हैं। गुरुजी सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने पूछा, "कैसा लग रहा है?" मैंने कहा, "गुरुजी, मैं उड़ सकता हूँ। मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ।"
अगले दिन मेरा सिर मुंडवा दिया गया। मुझे लामाओं वाले लाल-पीले वस्त्र दिए गए। अब मैं बिमल दे नहीं रहा था। मेरा पुराना 'मैं' उस पत्थर पर ही छूट गया था। गुरुजी ने कहा, "सत्य का रास्ता बहुत सरल है। आडंबर की जरूरत नहीं। बस इस मंत्र को अपनी साँस बना ले।"
और उस दिन से, हर साँस के साथ, हर धड़कन के साथ, तिब्बत के उन दुर्गम रास्तों पर चलते हुए, मेरे भीतर बस एक ही गूंज थी जो आज भी मेरे साथ है:
अब मैं बिमल दे नहीं, एक नव-दीक्षित लामा था। मेरा काम था मंदिर की सफाई करना और गुरुजी के पास रहना।
ॐ मणि पद्मे हूँ... ॐ मणि पद्मे हूँ... ॐ मणि पद्मे हूँ...
६ . मौन लामा और तिब्बत का मिशन
दीक्षा के बाद, गुरुजी ने अपना असली प्लान बताया। हमें तिब्बत (ल्हासा) जाना था। लेकिन १९५० के बाद चीनी सैनिकों ने बॉर्डर सील कर दिया था। भारतीयों का जाना असंभव था, पकड़े जाने पर मौत या जेल पक्की थी।
मैं डर गया। "गुरुजी, मैं तो भारतीय हूँ, मुझे तिब्बती भाषा भी नहीं आती। वे मुझे पकड़ लेंगे।"
गुरुजी ने मेरी आँखों में देखा और अपनी योजना बताई: "तू चिंता मत कर। बॉर्डर पर हम कहेंगे कि तू एक 'मौन लामा' (Silent Monk) है। तूने मौन व्रत ले रखा है। तुझे एक शब्द नहीं बोलना है। गूंगा बनकर रहना है।"
यह सुनकर मेरी रूह कांप गई, लेकिन साथ ही एक रोमांच भी दौड़ गया। एक १७ साल का लड़का, अब एक 'मौन लामा' के भेष में, दुनिया की छत—तिब्बत की ओर जाने के लिए तैयार था।
गया से गंगटोक तक की यह यात्रा सिर्फ भूगोल बदलने की नहीं थी। यह एक आवारा लड़के के 'शिष्य' बनने की कहानी थी। उस दिन मैंने सीखा कि जब आप संसार को छोड़ने की हिम्मत करते हैं, तभी आप खुद को पा सकते हैं।
मेरी तिब्बत यात्रा की रोमांचक कहानी और बॉर्डर पार करने के किस्से अगले ब्लॉग में...
तब तक के लिए— ॐ मणि पद्मे हूँ...
स्रोत का संदर्भ :
यह कहानी मूल रूप से बंगाली भाषा में एक यूट्यूब वीडियो श्रंखला पर आधारित है, जो भू-पर्यटक बिमल दे के अनुभवों का वर्णन करती है। यह ब्लॉग पोस्ट उसी मूल बंगाली कथा का हिंदी रूपांतरण है।

This is a real life example how devotion, faith and surrender to God beats all odds.
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