भाग 3 - तिब्बत के भीतर: एक 'मौन लामा' की आँखों देखी

धर्म संकट: जब जीने के लिए एक शाकाहारी साधु को खाना पड़ा मांस।

चुम्बी घाटी पार करने बाद हम तिब्बत के भीतरी इलाकों में थे। यहाँ की हवा में सिर्फ ठंड नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी गंध और रहस्य था। यहाँ मैंने जो देखा, उसने मेरे भारतीय संस्कारों और मेरी सोच को झकझोर कर रख दिया।

१. मांसाहार की दुविधा: जब साधु को खाना पड़ा मांस

चलते-चलते शाम हो गई थी। हम एक बूढ़ी तिब्बती महिला के घर रुके। बाहर हड्डियों को जमा देने वाली ठंड थी, लेकिन घर के भीतर अंगीठी की आग ने जान में जान डाल दी।

उस बूढ़ी माँ और उसकी बेटी ने हमारे लिए खाना बनाना शुरू किया। उन्होंने एक बड़े बर्तन में पानी, आलू और आटे की लोइयां डालीं। लेकिन फिर... उन्होंने एक सूखी हुई चीज उठाई और उसे चाकू से काट-काट कर बर्तन में डालना शुरू किया। जैसे ही वह उबलने लगा, एक जानी-पहचानी गंध उठी। वह मांस था! सूखे हुए भेड़ का मांस!

मैं १७ साल का एक बंगाली ब्राह्मण और ऊपर से अब एक 'साधु'। मेरे संस्कारों ने विद्रोह कर दिया। मैंने घबराकर गुरुजी (गेशे रेपतेन) का हाथ पकड़ा और फुसफुसाया: "गुरुजी! यह क्या? इसमें मांस है! हम तो साधु हैं, हम यह कैसे खा सकते हैं?"

गुरुजी ने मुझे शांत किया और तिब्बत की एक कड़वी सच्चाई समझाई: "बेटा, यह भारत नहीं है। यहाँ जमीन बंजर है, यहाँ सब्जियां नहीं उगतीं। यहाँ जिंदा रहने के लिए शरीर को गर्मी चाहिए और वह सिर्फ जौ (Sattu) और मांस से मिलती है।"

उन्होंने आगे कहा: "बौद्ध लामा खुद कभी किसी जीव की हत्या नहीं करते। यह पाप है। लेकिन अगर कोई गृहस्थ श्रद्धा से भिक्षा में मांस दे, तो हम उसे अस्वीकार नहीं करते। तथागत (बुद्ध) का नियम है—जो मिले, उसे प्रसाद समझ कर ग्रहण करो।"

जब वह गरमा-गरम 'थुकपा' (Thukpa) मेरी थाली में आया, तो मेरी भूख मेरे संस्कारों पर भारी पड़ गई। मैंने आँख बंद करके उसे खा लिया। उस बर्फीली रात में उस सूप ने मुझे जमने से बचा लिया। उस दिन मैंने सीखा कि धर्म परिस्थितियों से बड़ा नहीं होता।


२. डुंगकर मठ और प्राचीन पोथियाँ

(The Dungkar Monastery & The Secret Revealed)

अगले पड़ाव में हम एक पहाड़ी पर स्थित डुंगकर मठ (Dungkar Monastery) पहुँचे। दूर से यह किसी किले (Fort) जैसा दिखता था। जैसे ही हम दरवाजे पर पहुँचे, दो खूंखार तिब्बती कुत्ते (Mastiffs) हम पर झपटने को तैयार थे। गनीमत थी कि वे जंजीरों से बंधे थे।

मठ के अंदर का दृश्य अद्भुत था। वहाँ के प्रधान लामा 'चु मिन्जेन' (Chu Minjen) मेरे गुरुजी के पुराने मित्र निकले। उन्होंने हमारा भव्य स्वागत किया।

वहाँ मैंने 'कंग्युर' (Kangyur) और 'तंग्युर' (Tangyur) नाम के ग्रंथ देखे।

  • ये कोई साधारण किताबें नहीं थीं। एक-एक पोथी २-२ फीट लंबी और इतनी भारी थी कि एक आदमी के लिए उठाना मुश्किल था।

  • मठाधीश ने बताया कि इन ग्रंथों को एक मठ से दूसरे मठ ले जाने के लिए गधों की जरूरत पड़ती है। एक गधा सिर्फ दो किताबें ही ढो सकता है!

  • यह भारत का ही ज्ञान था। हजारों साल पहले भारत से गए संस्कृत ग्रंथों का यह तिब्बती अनुवाद था।

बातचीत के दौरान मठाधीश की नजर मुझ पर पड़ी। वे बहुत विद्वान थे। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और अचानक हिंदी में पूछा: "तुम किधर का आदमी हो?"

मैं सकपका गया। क्या मैं झूठ बोलूँ? लेकिन एक मठाधीश से झूठ बोलना पाप लगा। मैंने धीरे से सच कह दिया: "मैं कलकत्ता (भारत) से हूँ।"

वे मुस्कुराए। उन्होंने गुरुजी से कहा, "आपका शिष्य बहुत साहसी है। इतनी कम उम्र में यह यात्रा आसान नहीं।" उन्होंने मेरा राज किसी को नहीं बताया। उस मठ की शांति और ज्ञान के भंडार ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था।

ज्ञान का खजाना: डुंगकर मठ में भारत से गए प्राचीन 'कंग्युर' ग्रंथ।

३. 'फारी': दुनिया का सबसे गंदा शहर और एक भारतीय मित्र

(Phari: The Filthiest Town & A Gift of Diary)

मठ की पवित्रता के बाद, हमारा सामना एक भयानक वास्तविकता से हुआ। हम फारी (Phari) शहर पहुँचे। तिब्बती भाषा में 'फारी' का अर्थ होता है—सूअर का बाड़ा (Pigsty)। और यह शहर अपने नाम को सार्थक कर रहा था।

वह शहर कैसा था?

  • वहाँ शौचालय या नालियां नाम की कोई चीज नहीं थी। लोग अपने घरों का सारा कचरा और गंदगी सीधे सड़क पर फेंक देते थे।

  • सदियों से कचरा फेंकते-फेंकते सड़कें इतनी ऊँची हो गई थीं कि कई घरों में घुसने के लिए अब सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता था!

  • ठंड के कारण वह गंदगी जम गई थी, इसलिए बदबू कम थी, लेकिन दृश्य घिनौना था।

  • विडंबना यह थी कि इस गंदगी के ठीक पीछे पवित्र चोमोल्हारी पर्वत (Mount Chomolhari) अपनी धवल आभा के साथ चमक रहा था। स्वर्ग और नरक एक साथ!

विरोधाभास: दुनिया का सबसे गंदा शहर 'फारी' और पीछे पवित्र चोमोल्हारी पर्वत।

मैं और गुरुजी बाजार में घूम रहे थे कि तभी पीछे से एक आवाज आई—"नमस्कार जी!" मैं चौंक गया। इस वीराने में हिंदी?

वह एक भारतीय व्यापारी थे—श्री शिव शंकर तिवारी। वे ऊन (Wool) का व्यापार करते थे और सालों से वहां रह रहे थे। उन्होंने मेरे चेहरे-मोहरे से पहचान लिया था कि मैं नेपाली या तिब्बती नहीं हूँ।

वे मुझे अपने घर ले गए। उन्होंने असली दार्जिलिंग चाय पिलाई (मक्खन वाली नहीं, चीनी वाली!)। जब उन्हें पता चला कि मैं एक बंगाली लड़का हूँ, तो वे बहुत खुश हुए। चलते समय उन्होंने पूछा, "बेटा, तुम्हें कुछ चाहिए?"

मेरी जेब खाली थी, लेकिन मन में इस अद्भुत यात्रा को लिखने की तड़प थी। मैंने कहा: "मुझे लिखने के लिए कुछ कॉपियाँ और पेंसिल चाहिए।"

तिवारी जी दुकान गए और मुझे ३ मोटी कॉपियाँ (Note-books) और २ पेंसिलें खरीदकर दीं। साथ ही १० रुपये नकद दिए। ये वही ३ कॉपियाँ थीं, जिनमें मैंने अपनी आगे की पूरी यात्रा का एक-एक पल लिखा। अगर उस दिन फारी की गंदगी में मुझे तिवारी जी न मिलते, तो आज 'तिब्बत की यह कहानी' कभी लिखी ही नहीं जाती।

एक अनमोल तोहफा: वीराने में मिले देशवासी ने दी वो डायरी, जिसमें लिखी गई यह अमर कहानी।
 

लेखक: बिमल दे (गेलन लामा)


(इसके बाद हम फारी से आगे बढ़े, जहाँ चीनी सैनिकों के बड़े-बड़े कैंप हमारा इंतजार कर रहे थे...)

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