भाग 4 - महातीर्थ की अंतिम यात्रा: ल्हासा, दलाई लामा और कैलाश-मानसरोवर का रहस्य
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| शिगात्से शहर और सामने 'ताशिलुन्पो मठ' की छतें सुनहरी चमक रही हैं। |
फारी (Phari) के नरक जैसे शहर और वहां एक भारतीय व्यापारी से मिली कॉपियों को सीने से लगाए, मैं और मेरे गुरु गेशे रेपतेन आगे बढ़े। अब तक की यात्रा शरीर की परीक्षा थी, लेकिन अब जो शुरू होने वाला था, वह आत्मा की परीक्षा थी। हमारे सामने था 'देवताओं का शहर'—ल्हासा, और शिव का धाम—कैलाश।
१. शिगात्से: सोने की छतों वाला शहर
बर्फीले तूफानों को चीरते हुए हम शिगात्से (Shigatse) पहुँचे। यह तिब्बत का दूसरा सबसे बड़ा शहर था। यहाँ का मुख्य आकर्षण था—ताशिलुन्पो मठ (Tashilhunpo Monastery)। यह पंचेन लामा का निवास स्थान था। मठ की सोने की छतें दूर से ही सूरज की रोशनी में चमक रही थीं।
मठ के भीतर हजारों लामा एक साथ मंत्रोच्चार कर रहे थे। उस गूँज से मेरा रोम-रोम कांप उठा। यहाँ चीनी सैनिकों का पहरा बहुत सख्त था। एक बार एक चीनी कमांडर ने मुझे रोका। उसने मेरी आँखों में झांककर देखा। मैं कांप रहा था, लेकिन मैंने अपनी जुबान नहीं खोली। गुरुजी ने तुरंत कहा: "यह जन्म से गूंगा है। यह बोल नहीं सकता।" सैनिक ने हिकारत से मुझे धक्का दिया और जाने दिया। मेरा 'मौन' ही मेरा कवच था।
२. ब्रह्मपुत्र (सांगपो) को पार करना: मौत का सफर
ल्हासा जाने के लिए हमें विशाल सांगपो नदी (ब्रह्मपुत्र) को पार करना था। वहाँ कोई पुल नहीं था, न ही लकड़ी की नावें। वहाँ चलती थीं—याक की खाल (Yak Skin Boats) से बनी गोल नावें। नदी का बहाव इतना तेज था कि एक गलती और सब खत्म। हम उस छोटी सी खाल की नाव में बैठे। लहरें हमें उछाल रही थीं। गुरुजी शांत बैठे थे, और मैं बस 'ॐ मणि पद्मे हूँ' का जाप कर रहा था। जब हम किनारे पहुँचे, तो मुझे लगा जैसे मुझे नया जीवन मिला है।
३. ल्हासा: देवताओं की भूमि में प्रवेश
और फिर, मेरी आँखों के सामने वह दृश्य आया, जिसका सपना हर बौद्ध भिक्षु देखता है—ल्हासा (Lhasa)। सामने पहाड़ की चोटी पर खड़ा था विशाल पोताला महल (Potala Palace)। लाल और सफेद रंगों का वह १३ मंजिला महल ऐसा लग रहा था मानो आकाश को छू रहा हो। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक साधारण बंगाली लड़का, जिसे घरवाले 'आवारा' समझते थे, आज दुनिया की छत पर खड़ा है।
हम जोखांग मंदिर (Jokhang Temple) गए, जो तिब्बत का सबसे पवित्र मंदिर है। वहाँ भगवान बुद्ध की वह मूर्ति थी जो राजकुमारी वेनचेंग चीन से लाई थीं। घी के हजारों दीयों की रोशनी में वह मूर्ति जीवित लग रही थी।
४. साक्षात् ईश्वर के दर्शन: दलाई लामा से भेंट
यह १९५६ का साल था। परम पावन १४वें दलाई लामा (जो आज भारत में हैं) उस समय बहुत युवा थे और ल्हासा में ही रहते थे। गुरुजी एक उच्च कोटि के लामा थे, इसलिए उन्हें महल के भीतर जाने की अनुमति मिली। मैं उनके पीछे-पीछे 'मौन लामा' बनकर चला।
भीड़ के बीच, जब मैंने दलाई लामा को देखा, तो समय रुक गया। उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो इस दुनिया का नहीं लग रहा था। उन्होंने हमारी ओर देखा और मुस्कुराए। मुझे लगा कि उनकी दृष्टि मेरे 'मौन' के नाटक को भेदकर मेरे भीतर के उस डरे हुए भारतीय लड़के को देख रही है। एक भारतीय का, भेष बदलकर, चीनी पहरे के बीच, दलाई लामा के सामने खड़ा होना—यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
५. अंतिम पड़ाव: कैलाश और मानसरोवर
ल्हासा के वैभव के बाद, गुरुजी ने कहा: "अब चलो वहां, जहाँ शिव और बुद्ध एक साथ विराजते हैं।" हम पश्चिम तिब्बत की ओर मुड़े। यह रास्ता वीरान और भयानक था। मीलों तक कोई इंसान नहीं, सिर्फ बर्फीली हवाएं और खूंखार डाकू (खम्पा)।
मानसरोवर: जब मैंने पहली बार मानसरोवर को देखा, तो मैं घुटनों के बल गिर पड़ा। नीलम जैसा नीला पानी। ऐसा लगा जैसे आकाश धरती पर उतर आया हो। कड़ाके की ठंड में मैंने उस बर्फीले पानी में डुबकी लगाई। उस डुबकी के साथ मेरी थकान, मेरा डर, मेरा अहंकार—सब धुल गया।
कैलाश परिक्रमा: सामने साक्षात् कैलाश पर्वत खड़ा था। काला पत्थर और उस पर सफेद बर्फ—जैसे महादेव भस्म लगाकर बैठे हों। हमने परिक्रमा शुरू की। १८,००० फीट की ऊँचाई पर डोलमा-ला दर्रा (Dolma La Pass) आया। साँस लेना मुश्किल हो रहा था। हर कदम पर लगता था कि अब प्राण निकल जाएंगे। लेकिन गुरुजी आगे चल रहे थे, और मैं उनके पदचिह्नों पर पैर रखता हुआ आगे बढ़ता रहा।
६. विदाई: वह पल जब गुरु छूट गए
यात्रा पूरी हो चुकी थी। हम वापस भारत-तिब्बत सीमा के करीब आ गए। अब मेरे घर लौटने का समय था।
मैं खुश था कि मैं घर जा रहा हूँ, लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ—गुरुजी? मैंने पूछा: "गुरुजी, आप भी चलिए न मेरे साथ भारत? मेरे घर?"
गुरुजी (गेशे रेपतेन) रुके। उन्होंने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में वही करुणा थी जो मैंने गया में पहली बार देखी थी। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा: "बेटा, हमारा साथ यहीं तक था। साधु का कोई घर नहीं होता। यह हिमालय ही मेरा घर है।"
मैं रोने लगा। "मैं आपके बिना नहीं जाऊंगा।" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा: "जाना तो होगा। तूने जो देखा है, जो सीखा है, वह दुनिया को बताना है। यही तेरी गुरु-दक्षिणा है।"
वे पीछे मुड़े और तिब्बत के धुंधलके में धीरे-धीरे ओझल हो गए। मैं खड़ा देखता रहा, जब तक कि उनका लाल चोगा कोहरे में विलुप्त नहीं हो गया।
उपसंहार
मैं अकेले भारत लौटा। मेरे हाथ में सिर्फ वो तीन कॉपियां (डायरी) थीं और गले में गुरुजी की दी हुई माला। मैं बिमल दे बनकर वापस आया था, लेकिन मेरे भीतर का वह 'मौन लामा' आज भी जिंदा है। वह आज भी कैलाश की हवाओं में अपने गुरु को ढूँढता है।
यह यात्रा अंत नहीं थी, यह तो एक 'अनंत यात्रा' की शुरुआत थी।
ॐ मणि पद्मे हूँ...
(यह कहानी बिमल दे की पुस्तक 'महातीर्थेर शेष यात्री' पर आधारित है।)







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