हिमालय के रहस्यों को उजागर करने वाले 'प्रज्ञाचक्षु': संत गुलाबराव महाराज की अद्भुत गाथा
परिचय क्या यह संभव है कि एक बालक जो बचपन से नेत्रहीन हो, वह दुनिया को 'दृष्टि' दे? क्या यह संभव है कि जिसने कभी स्कूल का मुंह न देखा हो, वह डार्विन और स्पेंसर जैसे वैज्ञानिकों के सिद्धांतों को चुनौती दे दे? और क्या यह संभव है कि 13वीं सदी के संत ज्ञानेश्वर 20वीं सदी में प्रकट होकर किसी को दीक्षा दें?
आधुनिक तर्क इन सवालों पर अटक सकता है, लेकिन संत गुलाबराव महाराज का जीवन इन सभी असंभव लगने वाली घटनाओं का जीता-जागता प्रमाण है। उन्हें 'प्रज्ञाचक्षु' (जिनकी बुद्धि ही नेत्र हो) और 'ज्ञानेश्वर कन्या' के नाम से जाना जाता है। मात्र 34 वर्ष की आयु में 139 ग्रंथ लिखने वाले इस महान संत की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है।
1. अंधकार में दिव्य प्रकाश का उदय (प्रारंभिक जीवन)
संत गुलाबराव महाराज का जन्म 6 जुलाई 1881 (आषाढ़ शुक्ल दशमी) को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के पास माधान गाँव में हुआ था। पिता गोंदुजी और माता अलोकाबाई ने बालक का नाम 'गुलाब' रखा।
नियति की परीक्षा बहुत कठिन थी। जब वे मात्र 4 महीने के थे, एक गलत औषधि के कारण उनकी आँखों की रोशनी चली गई। दुखों का पहाड़ यहीं नहीं रुका—जब वे 4 वर्ष के थे, तो उनकी माता का साया भी सर से उठ गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी नानी के गाँव 'लोनी टाकली' में हुआ।
यहीं से उनके भीतर छिपी दिव्यता प्रकट होने लगी। गाँव वाले हैरान रह जाते जब नेत्रहीन बालक गुलाब कुएं पर पानी भरने आई महिलाओं को उनके नाम से पुकार लेता। रात के समय परिवार वाले देखते कि नन्हा गुलाब समाधि में बैठा है और उसकी सांसें रुकी हुई हैं। यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि एक सिद्ध योगी था।
2. बिना पढ़े वेदों का ज्ञान
गुलाबराव महाराज ने कभी स्कूली शिक्षा नहीं ली, फिर भी 10 वर्ष की आयु तक उन्हें वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों का गहरा ज्ञान हो गया था। उनकी स्मरण शक्ति (Memory) इतनी तीव्र थी कि वे दूसरों से ग्रंथ पढ़वाकर सुनते और एक बार में ही उसे कंठस्थ कर लेते।
माना जाता है कि उनमें ऐसी 'मानसिक दृष्टि' थी कि वे किसी भी भाषा की पुस्तक को हाथ में लेकर उसे बिना पढ़े ही समझ लेते थे। यही कारण है कि 1902 में, मात्र 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने 'डार्विन मत समीक्षा' और 'मानभाव' जैसे ग्रंथ लिखकर डार्विन के विकासवाद और हरबर्ट स्पेंसर के सिद्धांतों की तार्किक आलोचना की।
3. मधुराद्वैत: कृष्ण की 'पत्नी' और संत ज्ञानेश्वर का दर्शन
संत गुलाबराव महाराज का भक्ति मार्ग अत्यंत अनोखा था। उन्होंने 'मधुराद्वैत' दर्शन की स्थापना की, जो ज्ञान (अद्वैत) और प्रेम (भक्ति) का संगम है।
1905 में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से आत्मिक विवाह रचाया। वे खुद को कृष्ण की 'पत्नी' और संत ज्ञानेश्वर की 'बेटी' मानते थे।
वे एक सुहागिन स्त्री की तरह मंगलसूत्र, कुमकुम और गहने धारण करते थे।
संत ज्ञानेश्वर का साक्षात दर्शन (1901): उन्होंने दावा किया कि 700 साल पहले समाधि ले चुके संत ज्ञानेश्वर महाराज ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपना शिष्य बनाया। आज आलंदी में संत ज्ञानेश्वर का जो प्रसिद्ध चित्र है, वह गुलाबराव महाराज के बताए वर्णन पर ही आधारित है, क्योंकि उन्होंने संत को अपनी दिव्य आँखों से देखा था।
4. हिमालय का सबसे बड़ा रहस्य: 'केशवपुरी'
महाराज के जीवन का सबसे रोमांचक पहलू हिमालय के एक गुप्त लोक 'केशवपुरी' का वर्णन है।
उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि हिमालय में एक भूमिगत सुरंग (Underground Tunnel) है जो सीधे केशवपुरी जाती है।
उस मार्ग पर भोजन और पानी की चिंता नहीं करनी पड़ती, वह स्वतः प्राप्त होता है।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि उस गुप्त लोक में भगवान वेदव्यास आज भी सशरीर जीवित हैं और ऋषियों को पुराण सुनाते हैं।
महाराज का कहना था कि वहां केवल वही जा सकता है जिसके पास तपस्या का 'अधिकार' हो।
5. महाप्रयाण
इस दिव्य आत्मा ने अपना कार्य बहुत जल्दी पूरा कर लिया। 20 सितंबर 1915 (वामन द्वादशी) को पुणे में, मात्र 34 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपने प्रिय शिष्य नारायणराव पंडित को अंतिम उपदेश दिया— "शास्त्रों पर निष्ठा रखो, यह मेरा अनुभव है," और ब्रह्म में लीन हो गए।
6. विरासत: एक सदी का संघर्ष और शोध (1915 - वर्तमान)
संत के जाने के बाद उनके ज्ञान को सहेजने का एक महायज्ञ शुरू हुआ, जो आज तक चल रहा है।
'मधुकोष': 25 वर्षों की तपस्या महाराज के विचारों को ढूंढना आसान नहीं था। उनके शिष्य श्री दत्तात्रय गणेश खापरे (भाऊसाहेब) ने 20-25 वर्षों तक कठोर परिश्रम करके 'मधुकोष' तैयार किया।
यह 600 पन्नों का एक ऐसा इंडेक्स है जिसमें 25,000 से अधिक विषयों को एक-एक वाक्य में सूत्रबद्ध किया गया है।
भाऊसाहेब ने अपनी अंतिम सांस तक यह काम किया और 20 में से 15 खंडों का कोष तैयार कर दिया।
डॉ. घटाटे और गोलवलकर गुरुजी का प्रसंग महाराज के साहित्य के मुख्य संशोधक डॉ. कृ. मा. घटाटे (जिन्होंने 1960 से प्रूफ रीडिंग शुरू की) बताते हैं कि जब वे महाराज पर अपना शोध (PhD) लिख रहे थे, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गोलवलकर गुरुजी ने उन्हें बहुत प्रोत्साहित किया।
जब गुरुजी ने महाराज का यह विचार पढ़ा कि "3000 वर्ष पूर्व विश्व में आर्य धर्म के अलावा कोई धर्म नहीं था," तो उन्होंने डॉ. घटाटे की पीठ थपथपाते हुए कहा था— "डरो मत, आगे बढ़ो। हमें पाश्चात्य भ्रम को तोड़ना है।"
आधुनिक युग में प्रसार
2015 में महाराज की जीवन शताब्दी पर डॉ. विजय भटकर (सुपरकंप्यूटर वैज्ञानिक) और श्री गोविंद देव गिरी महाराज ने उनके कार्यों को विश्व पटल पर रखा।
आज महाराज पर 13 PhD हो चुकी हैं।
संस्कृत में उन पर 1000 और 1200 श्लोकों के दो महाकाव्य लिखे जा चुके हैं।
संत गुलाबराव महाराज का जीवन हमें बताता है कि दृष्टि आँखों में नहीं, अंतरात्मा में होती है। एक नेत्रहीन बालक से 'विश्वगुरु' बनने तक की उनकी यात्रा, आयुर्वेद और विज्ञान पर उनकी पकड़, और हिमालय के रहस्यों पर उनकी वाणी—यह सब सिद्ध करता है कि वे एक साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि एक अवतारी पुरुष थे। उनका साहित्य आज भी मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ है।






2015 में महाराज की जीवन शताब्दी par गोविंद देव गिरी महाराज ने उनके कार्यों को विश्व पटल पर रखा। वे उनको अपना गुरु मानते हैँ, और आलंदी में ही, गोविन्द गिरी महाराज ने वेदव्यास विश्वविद्यालय की स्थापना की है, जो गुरुकुल पद्धति से बच्चों को शिक्षा प्रदान करता है, भारत में ऐसे 30-35 गुरुकुल चल रहे हैँ |🙏
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