ऋषिकेश का वह रहस्यमयी गुफा और एक मृत साधु का जीवित दर्शन

क्या मृत्यु ही जीवन का अंत है? या फिर कुछ इच्छाएं, कुछ बंधन इतने प्रबल होते हैं कि वे मृत्यु की सीमा को भी लांघ जाते हैं? आज की "अनंत यात्रा" की कहानी एक ऐसे ही अनुभव के बारे में है, जो तर्क और विज्ञान की सारी दलीलों को खारिज कर देती है। यह कहानी है स्वामी तीर्थानंद जी के जीवन के उस अध्याय की, जहाँ लौकिक और अलौकिक के बीच की रेखा मिट गई थी।

शुरुआत: एक विश्वास और एक प्रश्न

कहानी की शुरुआत एक शांत कमरे से होती है, जहाँ लेखक शुभमानस घोष स्वामी तीर्थानंद जी से "गुरु लाभ" और ईश्वर प्राप्ति के बारे में पूछ रहे थे। स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "गुरु लाभ बड़ा सीधा नहीं है। उससे पहले चैतन्य लाभ होता है... याद है न बाबा के थान वाली घटना?"

लेखक सिहर उठे। वह घटना ही ऐसी थी कि रीढ़ में सिहरन दौड़ जाए। स्वामी जी ने गंभीर स्वर में कहा, "यह जगत ईश्वर की कल्पना है, एक कहानी है। और कभी-कभी, इच्छाशक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह मृत्यु के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है।"



शोक और हठ: मृत्यु को चुनौती

यह उस समय की बात है जब स्वामी तीर्थानंद संन्यास लेने से पहले एक साधारण गृहस्थ थे। उनकी पत्नी, जिसे वे बेइंतहा प्यार करते थे, अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गईं। पत्नी के वियोग ने उन्हें पागल कर दिया था। श्मशान की राख को साक्षी मानकर उन्होंने प्रतिज्ञा की थी—"जिस नारी के लिए आज रो रहा हूँ, उसे तंत्र साधना के बल पर पुनर्जीवित करके ही दम लूँगा।"

इसी पागलपन और हठ को लेकर वे अच्छे तांत्रिक की खोज में भटकते-भटकते ऋषिकेश पहुँच गए।



जंगल का रास्ता और रहस्यमयी गुफा

ऋषिकेश में उन्हें खबर मिली कि एक बहुत ही सिद्ध महापुरुष, स्वामी जीवानंद बाबा, कामाख्या से आए हैं और जंगल की एक गुफा में देह त्यागने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तीर्थानंद जी को लगा कि शायद यही वो गुरु हैं जो उनकी पत्नी को वापस ला सकते हैं।

एक स्थानीय युवक, शंभू, को साथ लेकर वे बीहड़ जंगल की ओर निकल पड़े। रास्ता दुर्गम था—कांटेदार झाड़ियां, सन्नाटा और दूर से आती नदी की कलकल। दोपहर बाद वे एक स्थान पर पहुँचे जहाँ शंभू ने इशारा किया कि गुफा यहीं है। लेकिन घनी झाड़ियों के बीच घुसकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था—सिर्फ बासी फूल और राख। शंभू ने कहा, "साहब, नसीब खराब है। बाबा शायद जगह छोड़कर चले गए या जल समाधि ले ली।"

निराश होकर तीर्थानंद जी वहीँ एक पत्थर पर बैठ गए। शंभू डर के मारे भाग गया, लेकिन तीर्थानंद जी को एक अजीब सी शांति महसूस हुई। शाम ढलने लगी, अंधेरा गहराने लगा और तभी... वह असंभव घटना घटी।



अंधेरे में एक रोशनी

अचानक उनकी नज़र गुफा की ओर गई। वहाँ एक जटाधारी साधु पत्थर पर बैठे थे। तीर्थानंद जी दौड़े और उनके चरणों में गिर पड़े, लेकिन साधु ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जैसे ही उन्होंने साधु को छूने की कोशिश की, साधु हवा में विलीन हो गए!

हैरान-परेशान तीर्थानंद जी झाड़ियों में पागलों की तरह उन्हें ढूंढने लगे और ठोकर खाकर गिर पड़े। गिरते ही उन्हें महसूस हुआ कि वे किसी के चरणों पर गिरे हैं। जब आँखें खोलीं, तो वे एक गुफा के अंदर थे! बाहर जंगल था, लेकिन यहाँ अंदर धूनी जल रही थी। सामने वही वृद्ध संन्यासी लेटे हुए थे और चार-पाँच शिष्य उन्हें घेरे बैठे थे।



वो रात: मृत या जीवित?

साधु का सीना जोर-जोर से धड़क रहा था, उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। तीर्थानंद जी ने अपनी झोली से होम्योपैथिक दवा निकालकर उनके मुंह में डाली। कुछ देर बाद साधु की सांसें स्थिर हो गईं।

शिष्यों ने तीर्थानंद जी को खाने के लिए दिया। पत्तल पर फल नहीं, बल्कि गरमा-गरम लुची और आलू दम थे, जिनसे भाप निकल रही थी! इस घने जंगल में ऐसा भोजन? तीर्थानंद जी ने भरपेट खाया और थकान के कारण वहीं सो गए।



रात के किसी पहर उनकी आँख खुली। धूनी बुझने वाली थी। उन्होंने देखा कि स्वामी जीवानंद जाग रहे हैं और उनकी ओर देख रहे हैं। साधु ने साफ बंगाली में पूछा, "की रे (क्या रे)?" तीर्थानंद जी चौंक गए। ऋषिकेश के जंगल में बंगाली साधु! स्वामी जीवानंद ने स्नेह से कहा, "तुझे मगरमच्छ से बचाया था न माँ ने? मैं भी उसी देश का हूँ, तेरा अपना। तू अपनी पत्नी के लिए आया है न? उसे पाने के लिए मेरे पास मत भटक, कामाख्या जा, वहां तुझे रास्ता मिलेगा।"

उस रात, उस गुफा में, एक अनजान बंधन ने दो आत्माओं को जोड़ दिया था। साधु ने "बाबा" पुकारने को कहा और फिर शांति से सो गए।


भोर का सत्य: रोंगटे खड़े कर देने वाला अंत

सुबह जब तीर्थानंद जी की आँख खुली, तो गुफा खाली थी। धूनी की राख ठंडी थी। बाहर कोहरा छाया हुआ था। उन्होंने देखा कि कुछ संन्यासी एक शव को ले जा रहे हैं। पूछने पर पता चला कि स्वामी जीवानंद का देहांत हो गया है।

तीर्थानंद जी उनके पीछे लपके, लेकिन कोहरे में सब ओझल हो गए। रास्ता भटकने के डर से वे वापस गुफा की ओर मुड़े अपना झोला लेने। लेकिन... वहाँ कोई गुफा थी ही नहीं! जिस जगह वे रात भर रहे, जहाँ उन्होंने खाना खाया, वहाँ सिर्फ घनी झाड़ियाँ थीं।

उनका झोला? वह पास के ही एक ऊंचे पेड़ की डाल पर लटक रहा था।

कांपते हुए वे किसी तरह ऋषिकेश वापस आए और प्रसिद्ध डॉक्टर त्रिपाठी से मिले। जब उन्होंने डॉक्टर को रात की घटना बताई, तो डॉक्टर ने चश्मा उतारकर अविश्वास से उन्हें देखा। डॉक्टर त्रिपाठी ने कहा, "क्या कह रहे हैं आप? स्वामी जीवानंद को मरे हुए तो तीन दिन हो चुके हैं! मैं खुद उन्हें देखने गया था।"

प्रेम की शक्ति

तीर्थानंद जी सन्न रह गए। अगर स्वामी जी तीन दिन पहले मर चुके थे, तो कल रात दवा किसने खाई? लुची-आलू दम किसने खिलाया? और वह झोला पेड़ पर कैसे पहुँचा?

बाद में उन्हें समझ आया—वह साधु अपनी मृत्यु के बाद भी केवल इसलिए रुके थे क्योंकि एक भक्त, उनके ही देश (बंगाल) का एक "माटी का बेटा", उनसे मिलने आ रहा था। उस अतृप्त इच्छा और प्रेम ने मृत्यु को भी तीन दिन के लिए रोक रखा था।

यह "अनंत यात्रा" हमें सिखाती है कि यह दुनिया उतनी ही नहीं है जितनी हम अपनी आँखों से देखते हैं। कभी-कभी विश्वास की एक डोर हमें उस पार की दुनिया से भी जोड़ देती है।

लेखक शुभमानस घोष

बांग्ला "साधक अलौकिक रहस्य"  के कहानी का हिन्दी रूपांतर 

Comments

  1. गुरुदेव, आपकी लेखनी से, इस तरह की अनेक यात्राओं की प्रतीक्षा में |

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